Custodial Death:-कस्टोडियल डेथ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, DGP से कहा- क्या पुलिस इस मामले की जांच के काबिल है?
Custodial Death:-छत्तीसगढ़ में पुलिस और न्यायिक हिरासत से जुड़े एक मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की पुलिस व्यवस्था पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मामले की जांच में हुई देरी और अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या राज्य पुलिस खुद इस मामले की निष्पक्ष जांच करने में सक्षम है। सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ के DGP अरुण देव गौतम भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत के सामने पेश हुए।
मामला बिलासपुर के श्रवण सूर्यवंशी उर्फ सरवन तामरे की मौत से जुड़ा है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक, श्रवण को 18 जनवरी 2024 को सीपत पुलिस ने आबकारी अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार उसके पास से 6 लीटर कच्ची महुआ शराब बरामद हुई थी। गिरफ्तारी के बाद उसे बिलासपुर केंद्रीय जेल भेजा गया।
Custodial Death:-जेल पहुंचने के कुछ दिन बाद बिगड़ी तबीयत
21 जनवरी 2024 को श्रवण की तबीयत बिगड़ने पर उसे बिलासपुर के CIMS अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान 22 जनवरी की सुबह उसकी मौत हो गई। मौत के बाद मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के निर्देश पर न्यायिक जांच शुरू की गई।
22 जुलाई 2024 की न्यायिक जांच रिपोर्ट में मौत का कारण सिर में लगी चोट से उत्पन्न जटिलताओं को बताया गया था। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि गिरफ्तारी के समय मेडिकल जांच में कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई थी।
Custodial Death:-परिवार ने मांगा था 50 लाख का मुआवजा
मृतक की पत्नी और उसकी दो नाबालिग बेटियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मामले की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार पुलिस एवं जेल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2024 में राज्य को ₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया था। कोर्ट ने माना था कि हिरासत में हुई मौत के मामले में राज्य अपने कर्मचारियों की लापरवाही के लिए जिम्मेदार है। अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसे मामलों में मुआवजे का उद्देश्य केवल राहत देना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी लापरवाही पर रोक लगाने वाला प्रभाव पैदा करना भी है।
Custodial Death:-सुप्रीम कोर्ट ने उठाए जांच पर सवाल
अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद जांच और FIR में हुई देरी अदालत के निशाने पर है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि मौत जनवरी 2024 में होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में इतना समय क्यों लगा।
राज्य की ओर से DGP ने अदालत को बताया कि मामले की जांच के आदेश दिए जा चुके हैं और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन अदालत ने जांच की प्रक्रिया और अब तक उठाए गए कदमों पर असंतोष जताया।
कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि यदि राज्य पुलिस ही मामले में संभावित रूप से जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच करेगी तो निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित होगी। अदालत ने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर जांच किसी दूसरी एजेंसी को सौंपने पर भी विचार किया जा सकता है।
Custodial Death:-न्यायिक रिपोर्ट को लेकर भी कोर्ट नाराज
सुनवाई के दौरान DGP की ओर से यह दलील दी गई कि मौत के कारण से जुड़ी न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग को उपलब्ध नहीं कराई गई थी। इस पर अदालत ने आपत्ति जताते हुए कहा कि वही रिपोर्ट हाईकोर्ट में राज्य के हलफनामे के साथ संलग्न थी।
मामले में न्यायिक जांच के दौरान सिर में लगी चोट से मौत की बात सामने आने के बावजूद FIR और जिम्मेदारी तय करने में हुई देरी ने अदालत की नाराजगी और बढ़ा दी।
Custodial Death:-हाईकोर्ट पहले ही मान चुका है राज्य की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट के 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया था कि हिरासत में किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मौत होने पर उसके परिजनों को मुआवजा दिया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति का आरोपी या कैदी होना उसके मौलिक अधिकारों को खत्म नहीं करता।
अब सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इस पुराने मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मामले की जांच किस एजेंसी से कराई जाती है और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई होती है।
