पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से भी लड़ा जा सकता है मुकदमा, आदेश जारी…

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बिलासपुर। हाईकोर्ट ने एक मामले में आदेश दिया है कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से मुकदमा लड़ा जा सकता है। इस टिप्पणी के साथ ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कोर्ट को आदेशित किया है कि याचिकाकर्ता से नए सिरे से शपथ पत्र पर जवाब लें। साथ ही गुण-दोष के आधार पर मामले का फैसला करें। याचिकाकर्ता यशोदा देवी जायसवाल ने प्रथम अतिरिक्त न्यायाधीश द्वारा 12 मार्च 2025 के आदेश को अपने अधिवक्ता के माध्यम से चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ता के अलावा अग्निश्वर व अभिजीत डे ने खसरा नंबर 17/31 और 17/32 की भूमि के संबंध में स्वामित्व की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए सिविल मुकदमा दायर किया, जिसका क्षेत्रफल क्रमशः 0.106 और 0.016 हेक्टेयर है। अग्निश्वर व अभिजीत और उनकी मां हेना डे ने अपना लिखित बयान प्रस्तुत किया।

इसी बीच अग्निश्वर डे की ओर से पावर ऑफ अटॉर्नी रिकॉर्ड पर लेने के लिए सीपीसी की धारा 151 के साथ सीपीसी के आदेश 8 नियम 1ए (3) के तहत एक आवेदन कोर्ट में दायर किया। विचारण के बाद ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को खारिज कर दिया। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता यशोदा जायसवाल ने अधिवक्ता संदीप दुबे के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय के सिंगल बेंच में हुई।

मामले की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा कि पावर ऑफ अटॉर्नी से मामले की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आएगा और ट्रायल कोर्ट द्वारा पेश किए जाने वाले साक्ष्य के आधार पर इसकी प्रासंगिकता की जांच की जा सकती है। अधिवक्ता दुबे ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को रद्द करने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेजों के अवलोकन से ऐसा प्रतीत होता है कि पावर ऑफ अटॉर्नी को रिकॉर्ड पर लेने के लिए सीपीसी के आदेश 8 नियम 1 ए (3) के तहत एक आवेदन अग्निश्वर डे द्वारा 15. जनवरी 2025 को पेश किया गया था।

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