तिल का ताड़’: रंग मंदिर में हास्य, व्यंग्य और सामाजिक सोच का अद्भुत संगम
रायपुर, 13 जुलाई 2025/ राजधानी रायपुर के गांधी मैदान स्थित रंगमंदिर में शनिवार की शामें पूरी तरह नाट्य प्रेमियों के नाम रहीं। अग्रगामी नाट्य समिति द्वारा प्रस्तुत शंकर शेष द्वारा लिखित नाटक ‘तिल का ताड़’ ने दर्शकों को हंसी के झोंकों में डुबो दिया। लेकिन इस हंसी के नीचे गहरी सामाजिक सोच और व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी छिपा हुआ था, जिसने सभी को भीतर तक झकझोर दिया।
करीब डेढ़ घंटे चले इस मंचन में संवाद, अभिनय और व्यंग्य ने दर्शकों को ठहाकों में लोटपोट कर दिया। नाटक का निर्देशन स्व. जलील रिजवी के रचनात्मक स्पर्श से इतना प्रभावशाली बन पड़ा कि मंच पर घटने वाला हर दृश्य, हर संवाद दर्शकों के दिल और दिमाग में बस गया।
कहानी में छुपा गहरा संदेश
‘तिल का ताड़’ की कहानी एक बेहद सामान्य लेकिन सामाजिक रूप से संवेदनशील मुद्दे को केंद्र में रखती है—किराए के मकान की तलाश। नाटक का केंद्रीय पात्र प्राणनाथ अविवाहित है और इसी कारण उसे मकान किराए पर नहीं मिल रहा। विवाहित होने का झूठ बोलने से शुरू हुई छोटी सी बात कैसे समाज की सोच, व्यवस्था और रिश्तों की उलझनों में उलझकर बड़ी हो जाती है, यही इस नाटक की आत्मा है।
गलतफहमियों का ऐसा ताना-बाना बुना गया कि किराए के मकान की तलाश एक सामाजिक व्यंग्य बन गई। कहानी में बनारसीदास की बेटी रंजना का प्रेम-प्रसंग प्राणनाथ नामक युवक से होता है। जब यह बात बनारसीदास को पता चलती है, तो वे अपनी बेटी के विवाह के लिए प्राणनाथ से मिलने उनके किराए के मकान में पहुंचते हैं। वहीं उनकी मुलाकात मकान मालिक धन्नामल से होती है, जो अपनी बेटी के लिए रिश्ता ढूंढ रहे होते हैं जहाँ से गलतफहमी शुरू होती है। बनारसीदास को लगता है कि धन्नामल, प्राणनाथ के पिता हैं और धन्नामल को लगता है कि बनारसीदास प्राणनाथ के पिता हैं। इसी भ्रम में दोनों की बातचीत और रिश्ता तय करने की चर्चा हास्य के ऐसे रंग में रंग जाती है कि दर्शक हर संवाद पर हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं।
बनरसीदास के किरदार में बलवंत सिंह खन्ना की थू ने जीता दिल
बनारसीदास के किरदार में बलवंत सिंह खन्ना ने विशेष शैली में हर संवाद के बाद “थू” जोड़कर एक अलग ही रंग भर दिया। बनारसीदास पिता के गंभीर किरदार में थे लेकिन जैसे ही वे कोई बात कहते—”लड़का बुजुर्गों का इज्जत तो करता है नहीं तो आज कल के लड़के पैदा हुए देर नहीं लगता और मजनू गिरी करने लगता है… थू!”—हॉल में ठहाके गूंज उठते। यह ‘थू’ शैली नाटक में हास्य का नया स्वाद बन गई, जिसे हर उम्र के दर्शकों ने खूब सराहा।

पंच लाइनें जो बनीं दर्शकों की जुबान पर
नाटक के दौरान कई पंच लाइनें ऐसी थीं जिन्होंने दर्शकों की विशेष वाहवाही लूटी:
- “16 आना शरीफ आदमी हूं… यकीन न हो तो अड़ोस-पड़ोस की लड़कियों से पूछ लो।”- प्राणनाथ
- “औरत क्या राशन कार्ड पर मिलती है?”- पतित पावन
- “भगवान ने छह बेटे और छह बेटियां दी हैं। छह को दहेज दूंगा, छह से वसूल लूंगा।”- धन्नामल
- “ऊपरी आमदनी ही असली आमदनी है।”…थू – बनारसीदास
- “जो खुशी अंग्रेजों को युद्ध जीतने में मिली, वो एक लड़की के बाप को अच्छा दामाद मिलने में होती है।”- धन्नामल
अन्य किरदार और मंच सज्जा का प्रभाव

नाटक में धन्नामल, मंजू, प्राणनाथ, गयाप्रसाद, अजय, ब्रह्मचारी, पतितपावन और अन्य कलाकारों ने भी अपने-अपने पात्रों को पूरी ईमानदारी और जीवंतता के साथ निभाया। मंच सज्जा, संगीत और संवाद अदायगी ने दर्शकों के अनुभव को और भी प्रभावशाली बना दिया।
हास्य में छिपा सामाजिक संदेश
‘तिल का ताड़’ ने साबित किया कि हास्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में सोच और सुधार का जरिया भी बन सकता है। नाटक ने दिखाया कि किस प्रकार समाज आज भी व्यक्ति की स्थिति से ज्यादा उसके ‘स्टेटस’ को महत्व देता है। छोटे-छोटे झूठ, जब सामाजिक व्यवस्थाओं से टकराते हैं, तो वे किस तरह बड़े-बड़े भ्रम और समस्याएं खड़ी कर सकते हैं, यह बात इस नाटक ने बखूबी समझाई।
अग्रगामी नाट्य संस्था का सफल आयोजन
‘अग्रगामी’ नाट्य समिति ने साधारण जीवन की एक छोटी सी बात को लेकर ऐसा प्रस्तुत किया, जिसे दर्शकों ने भरपूर सराहा। रंगमंदिर ठसाठस भरा रहा और दर्शकों ने नाटक के अंत में कलाकारों को खड़े होकर तालियां बजाकर सम्मान दिया।

कुल मिलाकर, ‘तिल का ताड़’ रायपुर में रंगमंच प्रेमियों के लिए न केवल ठहाकों से भरी शाम बना, बल्कि जीवन में सरलता और सकारात्मक सोच बनाए रखने का एक जरूरी संदेश भी दे गया।
